11/04/2026
उत्तराखंड की दो तस्वीरें: एक तरफ मनोरंजन की चकाचौंध, दूसरी तरफ संघर्ष की बेड़ियां!
देवभूमि उत्तराखंड आज दो अलग-अलग रास्तों पर चलने वाली शख्सियतों के बीच खड़ा है। एक तरफ सौरभ जोशी हैं, जो कुमाऊं की वादियों से उठकर आज देश के सबसे बड़े व्लॉगर बन चुके हैं। उनकी सफलता, उनकी लग्जरी कारें और उनका पारिवारिक चित्रण करोड़ों लोगों को लुभाता है। वे उत्तराखंड का नाम मनोरंजन की दुनिया में चमका रहे हैं, लेकिन जनहित के मुद्दों और पहाड़ की समस्याओं पर उनकी चुप्पी अक्सर सवाल खड़े करती है।
वहीं दूसरी ओर बिरजू मयाल जैसे शख्स हैं, जिन्होंने अपनी जवानी और शरीर पहाड़ के हक-हकूक की लड़ाई में झोंक दिया। बिरजू ने कभी कैमरे के पीछे छिपकर व्यूज नहीं बटोरे, बल्कि धरातल पर उतरकर अधिकारियों से दो-दो हाथ किए।
बिरजू मयाल: जनता के लिए लड़ी गई एक अकेली लड़ाई
बिरजू मयाल का संघर्ष किसी से छिपा नहीं है:
अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने से लेकर जंगलों को भू-माफियाओं से बचाने तक, वे हर मोर्चे पर खड़े रहे।
स्कूल, अस्पताल और सड़कों की बदहाली पर उन्होंने सिस्टम को आईना दिखाया।
नतीजतन, आज वे दर्जनों मुकदमों के बोझ तले दबे हैं और शारीरिक रूप से भी टूट चुके हैं।
कहाँ है समाज और मीडिया?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बिरजू जैसे लोग जनता के लिए अपना सिर फुड़वा रहे थे, तब मीडिया उनके पीछे भागता था। लेकिन आज, जब उन्हें मदद और समर्थन की जरूरत है, तो न सरकार साथ है और न ही वह जनता जिसके लिए उन्होंने लाठियां खाईं।
यह समाज की विडंबना ही है कि जो हमें मनोरंजन देता है, उसे हम सिर-आंखों पर बैठाते हैं, लेकिन जो हमारे अस्तित्व और अधिकारों के लिए लड़ता है, उसे हम अकेला छोड़ देते हैं। उत्तराखंड को तय करना होगा कि उसके असली नायक कौन हैं—वे जो कैमरे पर मुस्कराते हैं, या वे जो अपनों के लिए सिस्टम से टकराते हैं।
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