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18/10/2025
 # #हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकतालफ़्ज़ मा'ना को पा नहीं सकताइश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहदअक़्ल का बोझ उठा नहीं सकताहोश आरि...
15/09/2024

# #हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकता
लफ़्ज़ मा'ना को पा नहीं सकता

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

होश आरिफ़ की है यही पहचान
कि ख़ुदी में समा नहीं सकता

पोंछ सकता है हम-नशीं आँसू
दाग़-ए-दिल को मिटा नहीं सकता

मुझ को हैरत है उस की क़ुदरत पर
अलम उस को घटा नहीं सकता

हम तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हमघबरा के पूछते हैं अकेले में जी से हममजबूरियों को अपनी कहें क्या किसी से हमलाए ...
13/08/2024

हम तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम
घबरा के पूछते हैं अकेले में जी से हम

मजबूरियों को अपनी कहें क्या किसी से हम
लाए गए हैं, आए नहीं हैं ख़ुशी से हम

कम-बख़्त दिल की मान गए, बैठना पड़ा
यूँ तो हज़ार बार उठे उस गली से हम

यारब! बुरा भी हो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का
शरमा रहे हैं इस की बदौलत किसी से हम

दिन ही पहाड़ है शब-ए-ग़म क्या हो क्या न हो
घबरा रहे हैं आज सर-ए-शाम ही से हम

देखा न तुम ने आँख उठा कर भी एक बार
गुज़रे हज़ार बार तुम्हारी गली से हम

मतलब यही नहीं दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का
कहने में उस के आएँ गुज़र जाएँ जी से हम

छेड़ा अदू ने रूठ गए सारी बज़्म से
बोले कि अब न बात करेंगे किसी से हम

तुम सुन के क्या करोगे कहानी ग़रीब की
जो सब की सुन रहा है कहेंगे उसी से हम

महफ़िल में उस ने ग़ैर को पहलू में दी जगह
गुज़री जो दिल पे क्या कहें 'बिस्मिल' किसी से हम

बिस्मिल अज़ीमाबादी

31/05/2024

Ya Allah Har gunah se Tauba chahita hu

14/05/2024
Razik Ansari ki ghazl अन्दर अंदर बिखर रहे हैं लोग ‘आदतन बन सँवर रहे हैं लोग ख़ौफ़ रस्तों पे इतना बिखरा है एक दूजे से डर ...
18/04/2024

Razik Ansari ki ghazl

अन्दर अंदर बिखर रहे हैं लोग
‘आदतन बन सँवर रहे हैं लोग

ख़ौफ़ रस्तों पे इतना बिखरा है
एक दूजे से डर रहे हैं लोग

मेरे घर के दिए बुझाने को
कान आँधी के भर रहे हैं लोग

हद में रहने की क्या क़सम खाई
अपनी हद से गुज़र रहे हैं लोग

बात इधर की उधर लगाने में
कुछ इधर कुछ उधर रहे हैं लोग

एक ऊँचे मक़ाम की ख़ातिर
कितना नीचे उतर रहे हैं लोग

17/04/2024

Shariq Kaifi ki ghazal

: ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम

सियाने थे मगर इतने नहीं हम
ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम

अना की बात अब सुनना पड़ेगी
वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम

अधूरी लग रही है जीत उस को
उसे हारे हुए लगते नहीं हम

हमें तो रोक लो उठने से पहले
पलट कर देखने वाले नहीं हम

बिछड़ने का तिरे सदमा तो होगा
मगर इस ख़ौफ़ को जीते नहीं हम

तिरे रहते तो क्या होते किसी के
तुझे खो कर भी दुनिया के नहीं हm

ये मंज़िल ख़्वाब ही रहती हमेशा
अगर घर लौट कर आते नहीं हम

कभी सोचे तो इस पहलू से कोई
किसी की बात क्यूँ सुनते नहीं हम

अभी तक मश्वरों पर जी रहे हैं
किसी सूरत बड़े होते नहीं हम

21/03/2024

Urdu निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल '

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूं मुझी में है समुंदर मेरा

किस से पूछूं कि कहां गुम हूं कई बरसों से
हर जगह ढूंढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा

एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे
मेरी आंखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा

मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा

आइना देख के निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा

13/03/2024

Sahi ibadat bahut mushkil hai huzur sir ho sajde me or Dil me duniya ka khyal ye ibadat nhi

ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए ,वक्त रुकता ही नही है किसी के लिए ,,अपने दिल को ना दुःख दो यूं ही,,,इस जमाने की कोई बेरूखी क...
02/03/2024

ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए ,
वक्त रुकता ही नही है किसी के लिए ,,
अपने दिल को ना दुःख दो यूं ही,,,
इस जमाने की कोई बेरूखी के लिए!
वक्त के साथ साथ चलता रहे ,
यही बेहतर है आदमी के लिए

12/02/2024

Faiz Ahmad Faiz:

जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था
जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था
आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर

उस की मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में

उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे बरसा है उसी बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है
तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट

ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने
तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के

इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी

यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के

अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त

शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है

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