29/03/2022
केले का पत्ता यानी द्वैत में अद्वैत
जब रावण की सेना को हरा कर और सीता जी को लेकर श्री राम चन्द्र जी वापस अयोध्या पहुंचे - तो वहां उन सब के लौटने की ख़ुशी में एक बड़े भोज का आयोजन हुआ।
वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे - लेकिन बेचारे सब ठहरे वानर ? तो सुग्रीव जी ने उन सब को खूब समझाया - देखो - यहाँ हम अतिथि हैं और अयोध्या के लोग हमारे स्वामी। तुम सब यहाँ खूब अच्छे से व्यवहार करना - हम वानर जाति वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना।
वानर भी अपनी जाति का मान रखने के लिये तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर श्री सुग्रीव से कहने लगा, " प्रभो ! हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार अच्छा रखें, किन्तु हम ठहरे बन्दर। कहीं भूल चूक भी हो सकती है - तो अयोध्या वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे - इसके लिये मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारु रूप से चलाये, कि कहीं इसी के लिये वानर आपस में लड़ने भिड़ने लगें तो हमारी छवि धूमिल होगी।"
अब वानरों में सबसे ज्ञानी, व श्री राम के सर्वप्रिय तो हनुमान ही माने जाते थे - तो यह जिम्मेदारी भी उन पर आई।
भोज के दिन श्री हनुमान सबके बैठने वगैरह का इंतज़ाम करते रहे , और सब को ठीक से बैठने के बाद श्री राम के समीप पहुंचे, तो श्री राम ने उन्हें बड़े प्रेम से कहा कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो। अब हनुमान पशोपेश में आ गये।उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं - वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने वाले थे। न तो उनके लिये बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता, तो हनुमान बेचारे पशोपेश में थे - ना प्रभु की आज्ञा टाली जाये, ना उनके साथ खाया जाये।
प्रभु तो भक्त के मन की बात जानते हैं । तो वे जान गये कि मेरे हनुमान के लिये केले का पत्ता नहीं है , ना स्थान है। उन्होंने अपनी कृपा से अपने से लगता हनुमान के बैठने जितना स्थान बढ़ा दिया (जिन्होंने इतने बड़े संसार की रचना की हो उन्होंने ज़रा से और स्थान की रचना कर दी)। लेकिन प्रभु ने एक और केले का पत्ता नहीं बनाया।
उन्होंने कहा " हे मेरे प्रिय हनुमान। यूं मेरे साथ मेरे ही केले के पत्ते में भोजन करो। क्योंकि भक्त और भगवान एक हैं - तो कोई हनुमान को भी पूजे तो मुझे ही प्राप्त करेगा (यही अद्वैत यानी एकेश्वर वाद है।)।"
इस पर श्री हनुमान जी बोले, "हे प्रभु - आप मुझे कितने ही अपने बराबर बतायें, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, ना तो कभी हो सकता हूँ - ना ही होने की अभिलाषा है। (यह है द्वैत, यानी जीव और ब्रह्म के बीच की मर्यादा) - मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा - आपके चरणों में ही मेरा स्थान था - और रहेगा।तो मैं आपकी थाल में से खा ही नहीं सकता।"
जब हनुमान जी ने प्रभु के साथ भोजन करने से इनकार कर दिया।तब श्री राम ने अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी - जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया। एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में हनुमान को कराया।तो जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते आज भी एक होते हुए भी दो हैं - और दो होते हुए भी एक है।
यानी द्वैत में अद्वैत। यही सृष्टि की व्यवस्था जो ब्रह्म और जीव के संबंध यानी द्वैत में अद्वैत को दर्शाती है। इसे समझ लिया तो जीवन से उद्धार तय है।