14/12/2016
एक बार एक अंधा और एक लंगड़ा बैठे थे । अचानक दोनों में लड़ाई शुरू हो गई । निम्न प्रकृति वाले या दुर्जन चरित्र के लोग बात-बात पर लड़ते रहते हैं । संयोग से एक देवी ने उन्हें देखा तो उनके मन में करुणा आ गई कि बेचारे कितने दुखी हैं ।अंधा देख नहीं पाता और लंगड़ा चल नहीं पाता । जिनके पैर न हों,आंख न हो,उसके लिए दुनिया आधी-अधूरी बन जाती है । अच्छा हो मैं इनकी व्यथा दूर करने दूं ।
देवी आईं और बोलीं - लड़ो मत,आखिर क्या चाहते हो ? मैं तुम्हें कुछ देना चाहती हूं । लेकिन दोनों आवेश में थे जिसमें बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। बुद्धि को सबसे ज्यादा निष्क्रिय बनाने वाला कोई है तो वह है आवेश । आवेश में व्यक्ति सोच नहीं पाता और सोचता भी है तो उलटा सोचता है । जो लंगड़ा था, देवी ने पहले उससे पूछा - क्या चाहता है ?
उसने कहा अंधे को लंगड़ा बना दो। जब अंधे से पूछा तू क्या चाहता है तो उसने कहा लंगड़े को अंधा बना दो । देवी को बहुत आश्चर्य हुआ । वह दुखी भी हुईं और आहत मन से उन्होंने कहा - मैं तुम दोनों का दुःख दूर करना चाहती थी। मैंने सोचा था कि लंगड़ा यह वरदान मांगेगा कि मेरे पैर ठीक हो जाएं और अंधा यह वरदान मांगेगा कि मेरी आंख ठीक हो जाए । पर तुम दोनों अपना हित छोड़कर एक दूसरे का अनिष्ट करने का वरदान मांग रहे हो ।
सचमुच आज का मानव भी जितना अपने दुःखों से दुखी नहीं है, उससे ज्यादा दूसरों के सुखों से दुखी है । यह मनुष्य के चरित्र की एक विडंबनापूर्ण स्थिति है । इस तरह की निम्न सोच एवं प्रकृति के लोगों ने परिवार ,समाज ,राष्ट्र एवं विश्व में नफरत, द्वेष एवं कलंक का वातावरण निर्मित कर रखा है । ऐसे दुर्जन चरित्र के लोग अपना हित नहीं करते, वे दूसरों का अनिष्ट करने में ही रस लेते हैं । स्वयं चाहे नष्ट ही हो जाएं, लेकिन दुनिया नष्ट करनी है । उनका मस्तिष्क असंतुलित होता है और उनमें नकारात्मकता अधिक सक्रिय होती है । जबकि सज्जन चरित्र वाला व्यक्ति कभी ऐसा नहीं करता । सज्जन चरित्र वाला होता तो लंगड़ा यह मांगता कि उस अंधे को आंख मिल जाए और अंधा यह मांगता कि लंगड़े के पैर ठीक हो जाएं । किंतु दुर्जन चरित्र दूसरे का अनिष्ट करने केलिए अपने स्वार्थ को भी नष्ट कर देता है ।
जिसका चरित्र सज्जन है, वह व्यक्ति दूसरे के दोष का उद्घाटन नहीं करेगा ।उसके गुणों का बखान करेगा, उसे प्रोत्साहन देगा कि देखो इसमें कितनी अच्छाई है, कितनी विशेषताएँ हैं । वह हमेशा उसे आगे बढ़ाने का प्रयास ही करेगा । किसी व्यक्ति में कमी है, दोष है - उसे सबके सामने कहने से बहुत बड़ा लाभ नहीं होगा । हमारा कर्तव्य है कि एकांत में उस व्यक्ति को उसकी कमी के बारे में बताने, समझाने का प्रयास करें कि तुम अपनी कमी का परिष्कार करो।
🌞हरि ॐ तत्सत 🌞