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मंगलू       दूसरे दिन भी बारिश के कारण मंगलू को कोई सवारी नहीं मिली थी। कहीं दूर अंधेरे में एक होटल की बत्ती जलती हुई दि...
25/12/2025

मंगलू
दूसरे दिन भी बारिश के कारण मंगलू को कोई सवारी नहीं मिली थी। कहीं दूर अंधेरे में एक होटल की बत्ती जलती हुई दिखाई दे रही थी। मंगलू भीगता हुआ रिक्शा लेकर वहां पहुंच गया। शायद अंदर कोई पार्टी चल रही थी। मंगलू को आस थी कि पार्टी खत्म होने पर उसे कोई सवारी मिल जाएगी। क्योंकि पहले भी वह इस होटल के सामने आता था और उसको कई बार सवारी मिल जाती थी। उसने रिक्शा दरवाजे के पास लगा दी और दीवार के सहारे बरसाती ओढ़कर बैठ गया। उसके कपड़े भीगे हुए थे। बरसाती जगह-जगह से फटी हुई थी। वह इससे अपने को भीगने से बचाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। बारिश बढ़ती जा रही थी और वह यह सोच रहा था कि इस बारिश में एक भी सवारी मिल जाए तो वह इतने पैसे दे देगी कि रिक्शा मालिक का किराया निकल जाएगा। जब बहुत देर तक कोई बाहर नहीं आया तो उसने होटल के बाहर बरामदे की छत के नीचे खड़े चौकीदार से आवाज देकर पूछा "ओ भरतवा कतनी देर बा पालटी छूटे मा?" चौकीदार भरत उसके ही गांव का था जब भी होटल में पार्टी होती तो वह मंगलू को संदेशा दे देता। "पता नहीं भैया का बताई... कतनी देर लागि। कौनों ठीक नाहीं....इहां तो पार्टी कई बार रात रात भर चलत बा।" मंगलूं फिर जाकर दीवार के पास बैठ गया। ठंड बढ़ती जा रही थी और रिक्शा वापस करने का टाईम भी हो चला था। आज तो मंगलू को लग रहा था अपने पैसों में से ही मालिक के पैसे देने पडे़ंगे।

मंगलू दीवार के सहारे से उठा। उसने अपनी बरसाती ठीक की और रिक्शा लेकर लौटाने चल दिया। कुछ समय बाद वह रिक्शा मालिक के घर के सामने खड़ा था। गेट के सामने पानी भरा था। मंगलू ने रिक्शा साइड पर बनी चैन के साथ बांध दी। फिर उसने कुर्ते की जेब से एक पॉलिथीन निकाला जिसमें कुछ नोट रखे थे। कुर्ते के भीगने की वजह से पॉलिथीन में रखे पैसे भी सीले से हो गए थे। इन नोटों को वह ऐसे देख रहा था जैसे विदा होती बेटी को कोई पिता देखता है। यही उसकी जमा पूंजी थी जिसमें से आज उसको मालिक का किराया भी देना था क्योंकि सुबह से उसकी तो बोहनी तक भी नहीं हुई थी। जैसे ही मंगलू ने पॉलिथीन खोला तो पैसों के साथ रखा उसका छोटा सा नोकिया ग्यारह सौ का फोन पानी में जा गिरा। इस फोन से वह कभी-कभी गांव बात कर लिया करता था। "बाह रे परमात्मा तुमहऊ कंगाली में आटा गीला करत हो, फोनवा भिगा दई। अब का जानी ईह ठीक होई का न। मंगलू ने धड़कते दिल से फोन को पानी से निकाला लेकिन कभी-कभी ईश्वर को भी तरस आ जाता है। मंगलू ने देखा फोन बिल्कुल सही था। यह देख उसके चेहरे पर चमक आ गई।

दरवाजा खटखटाने पर रिक्शा मालिक मुसद्दी घर से छाता लेकर बाहर निकल आया। मंगलू ने उसको आज का किराया पकड़ा दिया लेकिन उसने यह नहीं बताया कि आज सुबह से कोई सवारी उसकी रिक्शा में नहीं बैठी थी। वह पैदल ही चलता हुआ बस अड्डे तक आ गया जहां पुल के नीचे उसके कुछ बर्तन रखे थे। यही मंगलू की रात का ठिकाना था। सर्दी बहुत ज्यादा थी। मंगलू ने चूल्हा जलाया और आग तापने लगा। वह रोज अपना रसोई का सामान यहीं छोड़ देता था और रिक्शा चलाने के पश्चात रात को वापस लौट आता था। गरीब इंसान के पास दो बर्तनों के अलावा और होता ही क्या है दुनिया कम से कम इतनी इंसानियत तो रखती है वह गरीब के बर्तन नहीं चुराती। मंगलू ने सामान के ऊपर रखा कपड़ा हटाया एक थैले में से आटा निकाला और सिक्के की परात में गूंधने लगा। चूल्हे में अलाव धीरे-धीरे जल रहा थी। हवा के ठंडे झोंकों से आग जलने में थोड़ी परेशानी हो रही थी। मंगलू ने दो कच्ची सी बड़ी बड़ी रोटी बनाई और प्याज के साथ खाने लगा।

वह अपने ऊपर ज्यादा पैसे खर्च ना करता था क्योंकि गांव में उसका एक परिवार था जिसमें उसकी पत्नी उसकी बेटी एक बेटा और उसकी बहू शामिल थे। बेटा रामप्रवेश वही गांव के एक खेत में मजदूरी करता था। इन दोनों के पैसों से ही परिवार का गुजारा होता था जबसे रामप्रवेश की शादी हुई थी तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई थी क्योंकि पत्नी लक्ष्मी गर्भ से थी। मंगलू की बेटी का अभी गौना नहीं हुआ था। उसकी विदाई के लिए भी मंगलू को पैसों की सख्त जरूरत थी। रोटी प्याज खाकर मंगलू वही पुल के नीचे एक चटाई बिछाकर लेट गया। सर्दी से बचने के लिए उसके पास मात्र एक कंबल था जो किसी दानी सज्जन ने उसको दिया था। सुबह के खाने की चिंता नहीं थी। पास वाले मंदिर में सेठ लोग कभी ब्रेड या कभी कुछ और बांट जाते थे। वही मंगलू और उस जैसे कई लोगों का रेस्टोरेंट था। सर्दी बढ़ती जा रही थी। कुछ समय बाद मंगलू ठिठुरने लगा तो उसकी नींद खुल गई। अब वह क्या करे। उसने सामने बैठे कुत्ते मोती को पुचकारकर अपने पास बुला लिया। मोती दुम हिलाता हुआ मंगलू के पास आकर लेट गया। उसके पास लेटने से मंगलू को सर्दी से थोड़ी राहत महसूस हुई। सुबह होते ही मंगलू ने मोती को दुत्कारकर भगा दिया। मोती ऐसे देख रहा था जैसे सोच रहा हो इंसान तू हमेशा मतलबी ही रहेगा। मेरे साथ सोकर भी तुझे वफा करनी ना आई। पूरी रात मेरी गर्मी का आनंद लेता रहा और सुबह तुझे अपने और मेरे भीतर का अंतर नजर आने लगा।

मंगलू ने अपने चटाई समेटी और कंबल अपने सामान पर डालकर रिक्शा लेने निकल गया। आज मौसम थोड़ा ठीक लगा। रिक्शा मालिक से रिक्शा लेकर वह तुरंत मंदिर के आगे आ गया। उसको लगा कहीं सेठ लोग खाना बांटकर लौट ना जाएं। मंदिर के बाहर लगे नल से उसने मुंह हाथ धोया और मांगने वालों की लाइन में बैठ गया जहां अन्य रिक्शा वाले भी आकर बैठ जाते थे। कुछ समय बाद एक मारुति वैन आकर रुकी। ड्राइवर ने वैन के पिछले हिस्से का दरवाजा खोला और उसमें से ब्रेड पकोडो़ं का बड़ा सा पतीला निकालकर नीचे रख दिया। फिर लाइन में खड़े एक समझदार से दिखने वाले युवक को बुलाकर उसने यह सब समान बांटने के लिए कह दिया। सभी लोग लाइन में बड़े अनुशासन से बैठकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे। युवक ने पहला ब्रेड पकौड़ा उठाकर अपने थैले में डाल लिया और फिर बारी-बारी सबको देने लगा। मंगलू को भी एक ब्रेड पकौड़ा मिल गया।उसने पकौड़ा अपनी रिक्शा की आगे की टोकरी में रख लिया। सुबह-सुबह मेट्रो स्टेशन से उसे एक महिला सवारी मिल जाती थी। इसलिए वह जल्दी से स्टेशन की ओर निकल गया। 'दीदी जी की मैट्रो आ गई। वह इस मेट्रो से उतर रही होंगी। 'मंगलू ने सोचा क्योंकि कल बरसात के कारण उसे यह सवारी भी नहीं मिली थी। थोड़ी ही देर में सवारियां सीढ़ियों से उतरने लगी और मंगलू बेचैनी से उस महिला का इंतजार करने लगा। सामने सीढ़ियों से अलका को उतरते देख मंगलू की बांछें खिल गई।

अलका रोज इस स्टेशन से उतरकर ऑफिस के लिए रिक्शा लिया करती थी। वह एक बहुत सुलझी हुई और दयालु लड़की थी। पहली बार जब मंगलू उसे मिला था तो ऑफिस तक मंगलू ने उचित किराया लिया था जो अलका को बहुत पसंद आया वरना अक्सर रिक्शा वाले पहले ज्यादा किराया बताते थे और मना करने पर किराए के विषय में बारगेनिंग शुरू कर देते। अलका को पाँच या सात रुपये फालतू देने में कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन उसको बारगेनिंग से सख्त नफरत थी। वह चाहती थी कि इंसान का काम छोटा हो या बड़ा इमानदारी जरूरी है।"कैसे हो मंगलू?" अलका ने पूछा।
"ठीक हूं दीदी जी।" मंगलू ने हंसते हुए कहा।
'पर कल बहुत बुरा हुआ। बारिश के कारण आप नहीं आए और फिर पूरा दिन हमारी बोहनी नहीं हुई। आपके कदम मेरी रिक्शा के लिए बहुत शुभ रहते हैं।" अलका उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगी लेकिन मंगलू अपनी ही धुन में कहता जा रहा था "कोई बात नहीं दीदी जी आज आप आ गई हो। आज मैं कल की भरपाई कर लूँगा।"
"मंगलू अगर एक दिन सवारी नहीं मिलती तो तुम्हें क्या अंतर पड़ता है। क्या तुम्हारे पास एक दिन गुजारे के लिए भी पैसे नहीं होते।" अलका ने मंगलू से पूछा ।
"दीदी जी पैसे तो होते हैं लेकिन रिक्शा मालिका के लिए रोज का 100 रुपये किराया मार जाता है। बिना कमाई के अपनी जमा पूंजी से यह सौ रुपये देना बहुत भारी पड़ता है और मान लो अगले दिन भी सो रुपए का काम नहीं हुआ तो क्या ही जमा पूंजी बाकी रह जाएगी?" मंगलू ने थोड़ा गंभीर होकर कहा। उसकी बात सुनकर अलका सोच में पड़ गई लेकिन उसका ऑफिस आ चुका था वह मंगलू से और कोई बात ना कर सकी। अलका ने उतरकर मंगलू को पैसे दिए और ऑफिस की ओर बढ़ गई। मंगलू ने पैसे पॉलिथीन में डाल लिए और रिक्शा वापस मोड़कर मेट्रो स्टेशन की ओर लौट गया। मेट्रो स्टेशन से ही रिक्शा वालों को सवारियाँ मिलने की सबसे ज्यादा आशा होती है ।
अलका को मंगलू की बात बार-बार याद आती रही। उसने अक्सर सुना था कि रिक्शावाले दिन भर कमाकर रात को ठेके की दुकान पर पहुंच जाते हैं। जिसकी रोटी की भी गारंटी नहीं वह क्या शराब पीता होगा अलका ने सोचा और निश्चय किया कि कल मंगलू से वह इस विषय में और जानकारी हासिल करेगी।
अगले दिन मंगलू से ज्यादा प्रतीक्षा अलका को थी। उसने रिक्शा पर बैठते ही मंगलू से पूछा "मंगलू एक बात बताओ रिक्शा मालिक के किराए के अलावा और तो कहीं नहीं देने होते?"
"क्या बात करते हो दीदी जी। रिक्शा वाले का जीवन बहुत कठिन होता है। रिक्शा मालिक के अलावा और बहुत से लेनदार होते हैं सब पिछले जन्मों का खेला है।जरूर जिसने पिछले जन्म में किसी से पैसे लेकर ना लौटाए होंगे इस जन्म में रिक्शावाला बनकर पैदा होता है। कई बार सवारी के चक्कर में रिक्शा गलत जगह पर खड़ी हो जाती है तो ट्रैफिक पुलिसवाले जुर्माना कर देते है। सवारी को कई बार जल्दबाजी होती है और रिक्शावाला लाल बत्ती लांघ जाता है तो पकड़ा जाता है।"
"मंगलू लाल बत्ती क्रॉस करना तो गलत है ना?" अलका ने कहा।
"दीदी जी रिक्शा वाले को लाल बत्ती की जगह भी रोटी दिखाई देती है।" प्रत्यक्ष में मंगलू मुस्कुरा रहा था लेकिन अलका उसकी आवाज में छिपे दर्द को पहचान गई।
"दूसरी बात रिक्शा वाले गलत जगह पर रिक्शा क्यों खड़ी करते हैं?" अलका ने पूछा
" दीदी जी इहमें रिक्शावाले का दोष नाहीं। सवारी रिक्शा अपनी सुविधा अनुसार पास से ही लेना चाहती हैं, रिक्शा स्टैंड तक चलना भी उसको मंजूर नहीं होता।" मंगलू की बात अलका को कहीं ना कहीं सही लग रही थी। अक्सर लोग एक कदम भी चलना पसंद नहीं करते। वे चाहते हैं कि रिक्शा उनको उनको बिलकुल पास से मिल जाए। इसलिए रिक्शावाले सवारी की सुविधा के अनुसार अपना ठिकाना बना लेते हैं।
"तो मंगलू रिक्शा वाले जो दिन भर कमाते हैं, मैंने सुना है रात को दारू में उड़ा देते हैं।" अलका को अब इस प्रश्न के उत्तर की जिज्ञासा थी
" दीदी जी सभी रिक्शा वाले एक से नहीं होते। और क्या दारू सिर्फ रिक्शा वाले ही पीते हैं का, दूसरा सब लोग नहीं पीटा का? मंगलू के इस प्रश्न का अलका के पास कोई जवाब नहीं था। "हां कई बार जादा थकान के कारण ऐसा होता है और कई बार कुछ लोग आदि भी होते हैं। लेकिन कई बार ड्रग माफिया सबका बहुत बड़ा हाथ होता है जो इन्हें नशे का शिकार बना देते हैं। हालात और गरीबी का मारा हुआ रिक्शावाला कुछ देर के सुकून के लिए अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर बैठता है। कई बार रिक्शा वाले की मौत और कुत्ते की मौत में ज्यादा अंतर नहीं रहता। दोनों ही सड़क पर चलते चलते मर जाते हैं। जब शरीर कमजोर हो जाता है और रिक्शा खींचने की हिम्मत नहीं रहती तो भी पापी पेट के लिए वह रिक्शा खींचता रहता है। जिससे एक दिन उसकी सांसें रुक जाती है। "मंगलू की ऐसी पीड़ादायक बातें सुनकर अलका का मन भर आया।
शाम के समय अलका जब अपनी मां के साथ चाय पी रही थी तो उसने इस विषय में उनसे बात की। अलका की मां एक सुलझी हुई महिला थी। उन्होंने बताया कि उनके पिता कभी भी रिक्शा वाले से पैसे के लिए बारगेनिंग नहीं करते थे। वे अक्सर कहते थे कि यह बेचारे अगर कुछ पैसे फालतू बोल भी देते हैं तो क्या हुआ। इनकी मेहनत, इनका पसीना सूखने से पहले दे देनी चाहिए। कितना दर्द होता है जब एक इंसान दूसरे इंसान का बोझ खींचता है। मां की बात सुनकर अलका की आंखों में आंसू आ गए। रात को खाने के बाद अलका के कान में मंगलू के शब्द गूंजते रहे और उसने निश्चय किया कि वह मंगलू को एक रिक्शा खरीद कर देगी ताकि उसे मालिक का किराया ना चुकाना पड़े और आय में थोड़ी बढ़ोतरी हो जाए।
अगले दिन सुबह जब मंगलू अलका से मिला तो अलका ने बोला "मंगलू मैं तुम्हें अगर खुद की रिक्शा ले दूं तो कैसा रहेगा।" अल्का की बात सुनकर मंगलू आवक रह गया। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। "दीदी जी अगर ऐसा हो गया तो हमारे बहुत पैसे बच जाएंगे।" मंगलू ने कहा।
"लेकिन मंगलू मेरी एक शर्त है कि बचे पैसों से तुम शराब नहीं पियोगे बल्कि आय का कुछ हिस्सा तुम जोड़कर एक साल बाद किसी अन्य जरूरतमंद को रिक्शा दोगे।"
" ठीक है दीदी जी।" मंगलू को अलका की शर्तें मंजूर थी। कुछ दिन बाद अलका ने एक रिक्शा लेकर मंगलू को दे दिया । आज मंगलू की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, उसे लगा कि वह एक बंधन से मुक्त हो गया है। रिक्शा मालिक के किराए की चिंता खत्म। अब उसको बीमारी या मजबूरी में रिक्शा नहीं चलानी पड़ेगी। चमचमाता हुआ रिक्शा मंगलू को बहुत भा रहा थी। उस दिन रात को वह रिक्शा की सीट पर ही सोया। उसे वह किसी डनलप के गद्दे से कम नहीं लग रही थी। अगले दिन सुबह मंगलू खुशी-खुशी रिक्शा लेकर निकला और सीधा मंदिर के पास पहुंच गया। उसने ईश्वर के आगे हाथ जोड़कर धन्यवाद किया। लेकिन रिक्शा नो पार्किंग जोन में खड़े करने के कारण ट्रैफिक पुलिस की गाड़ी उठाकर ले गई। मंगलू ने किसी तरह जुर्माना भरकर अपना रिक्शा छुड़वा लिया। इंसान का भाग्य ही अगर खराब हो तो मुसीबतों से उसका दामन कभी नहीं छूट पाता। एक बार एक मनचले गाड़ी वाले की टक्कर से मंगलू की रिक्शा का पहिया क्षतिग्रस्त हो गया जिसकी मरम्मत में मंगलू के काफी पैसे लग गए लेकिन फिर भी अलका को दिए वचन के लिए कुछ पैसे अलग से जमा अवश्य करता था।

एक दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने मंगलू का जीवन ही बदल डाला। चौराहे पर अक्सर रेडलाइट होने के कारण बस से कुछ यात्री वहां उतरते थे। सवारियाँ हथियाने के चक्कर में रिक्शा वालों की होड़ सी वहां लग जाती जिससे लोगों को काफी असुविधा होती थी। इस पर कई बार ट्रैफिक पुलिस को सख्ती बरतनी पड़ती थी एक दिन एक ट्रैफिक हवालदार ने गुस्से में आकर वहां से रिक्शा वालों को खदेड़ना शुरू कर दिया। मंगलू का ध्यान बस से उतरती हुई सवारियों पर था। जब वह नहीं हटा तो हवालदार ने सूए से मंगलू का टायर फाड़ दिया और डंडे से रिक्शा का शीशा भी तोड़ दिया। यह देखकर मंगलू बहुत उत्तेजित हो गया और उसने आव देखा ना ताव पास पड़ा बड़ा सा पत्थर उठाकर ट्रैफिक हवलदार के सिर पर दे मारा। हवालदार वहीं सड़क पर ही ढेर हो गया। इतने में बाकी पुलिस वाले भी वहां आ पहुंचे और मंगलू की पहले तो जमकर पिटाई की और बाद में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कोर्ट की ओर से मंगलू को चौदह बरस की सजा सुनाई गई। जब वह सज़ा सुनकर कोर्ट से बाहर निकला किसी दुख और परेशानी की जगह मंगलू के चेहरे पर संतोष के भाव थे। वह सोच रहा था चलो जेल में अब रोटी, सर्दी, जुर्माना, रेड लाइट यह सब चिंताएं अब नहीं होंगी और वह आराम से रोटी खा पाएगा।

बुंदेलखंड, चित्रकूट ज़िले के मऊ तहसील में रहने वाले किसान इंद्र कुमार मौर्य ने  ITI की पढ़ाई की उसके बाद उन्होंने TATA M...
16/10/2024

बुंदेलखंड, चित्रकूट ज़िले के मऊ तहसील में रहने वाले किसान इंद्र कुमार मौर्य ने ITI की पढ़ाई की उसके बाद उन्होंने TATA MOTORS में 8 महीने नौकरी की, नौकरी में मन नहीं लगा तो वो घर वापिस आ गये और अपने पिता के साथ मिलकर नयी तकनीक से खेती कर रहें हैं।

इंद्र कुमार के पास 6 बीघा ज़मीन है जिसमे 3.5 बीघा में करेले की खेती करते हैं और बाक़ी के हिस्से में टमाटर और अन्य सब्ज़ियों की। इंद्र कुमार कहते हैं की पानी बुंदेलखंड के किसानों की सबसे बड़ी समस्या है इससे निपटने के लिए उन्होंने ड्रिप इरीगेशन को अपनाया। लेकिन यहाँ एक और समस्या छुट्टा पशुओं की है, जिससे बचने के लिए वे काफी प्रयास कर रहे हैं।
“पहले हमारी सालाना कमाई सिर्फ़ 2.5 लाख रुपये थी लेकिन जब से करेले की खेती शुरू की है उनकी कमाई बढ़ के 4 लाख रुपये हो गई है”- किसान इंद्र कुमार

शानदार क्वालिटी होने की वजह से इनके करेले की डिमांड अब दूसरे ज़िलों में भी हो रही है, स्थानीय किसान और व्यापारी इन्हें “करेला किंग” कहकर बुलाते हैं।

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15/08/2023

बिखरते रिश्ते...

मोहन बेटा ! मैं तुम्हारे काका के घर जा रहा हूँ . क्यों पिताजी ? और तुम आजकल काका के घर बहुत जा रहे हो ...? तुम्हारा मन मान रहा हो तो चले जाओ ... पिताजी ! लो ये पैसे रख लो , तुम्हारे काम आ जाएंगे .*

*पिताजी का मन भर आया . उन्हें आज अपने बेटे को दिए गए संस्कार लौटते नजर आ रहे थे .*

*जब मोहन स्कूल जाता था ... वह पिताजी से जेब खर्च लेने में हमेशा हिचकता था , क्यों कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी . पिताजी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से घर चला पाते थे ... पर माँ फिर भी उसकी जेब में कुछ सिक्के डाल देती थी ... जबकि वह बार-बार मना करता था .*

*मोहन की पत्नी का स्वभाव भी उसके पिताजी की तरफ कुछ खास अच्छा नहीं था . वह रोज पिताजी की आदतों के बारे में कहासुनी करती थी ... उसे ये बडों से टोका टाकी पसन्द नही थी ... बच्चे भी दादा के कमरे में नहीं जाते , मोहन को भी देर से आने के कारण बात करने का समय नहीं मिलता .*

*एक दिन पिताजी का पीछा किया ... आखिर पिताजी को काका के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है ? वह यह देख कर हैरान रह गया कि पिताजी तो काका के घर जाते ही नहीं हैं ! !!*

*वह तो स्टेशन पर एकान्त में शून्य मनस्क एक पेड़ के सहारे घंटों बैठे रहते थे . तभी पास खड़े एक बजुर्ग , जो यह सब देख रहे थे , उन्होंने कहा ... बेटा...! क्या देख रहे हो ?*

*जी....! वो .*
*अच्छा , तुम उस बूढ़े आदमी को देख रहे हो....? वो यहाँ अक्सर आते हैं और घंटों पेड़ तले बैठ कर सांझ ढले अपने घर लौट जाते हैं . किसी अच्छे सभ्रांत घर के लगते हैं .*

बेटा ...! ऐसे एक नहीं अन
बुजुर्ग माएँ बुजुर्ग पिता तुम्हें यहाँ आसपास मिल जाएंगे !

*जी , मगर क्यों ?*

*बेटा ...! जब घर में बड़े बुजुर्गों को प्यार नहीं मिलता.... उन्हें बहुत अकेलापन महसूस होता है , तो वे यहाँ वहाँ बैठ कर अपना समय काटा करते हैं !*

*वैसे क्या तुम्हें पता है.... बुढ़ापे में इन्सान का मन बिल्कुल बच्चे जैसा हो जाता है . उस समय उन्हें अधिक प्यार और सम्मान की जरूरत पड़ती है , पर परिवार के सदस्य इस बात को समझ नहीं पाते .*
*वो यही समझते हैं इन्होंने अपनी जिंदगी जी ली है फिर उन्हें अकेला छोड देते हैं . कहीं साथ ले जाने से कतराते हैं . बात करना तो दूर अक्सर उनकी राय भी उन्हें कड़वी लगती है . जब कि वही बुजुर्ग अपने बच्चों को अपने अनुभवों से आनेवाले संकटों और परेशानियों से बचाने के लिए सटीक सलाह देते है .*

*घर लौट कर मोहन ने किसी से कुछ नहीं कहा . जब पिताजी लौटे , मोहन घर के सभी सदस्यों को देखता रहा .*

*किसी को भी पिताजी की चिन्ता नहीं थी . पिताजी से कोई बात नहीं करता , कोई हंसता खेलता नहीं था . जैसे पिताजी का घर में कोई अस्तित्व ही न हो ! ऐसे परिवार में पत्नी बच्चे सभी पिताजी को इग्नोर करते हुए दिखे !*

*सबको राह दिखाने के लिऐ आखिर मोहन ने भी अपनी पत्नी और बच्चों से बोलना बन्द कर दिया ... वो काम पर जाता और वापस आता किसी से कोई बातचीत नही ...! बच्चे पत्नी बोलने की कोशिश भी करते , तो वह भी इग्नोर कर काम मे डूबे रहने का नाटक करता ! !! तीन दिन मे सभी परेशान हो उठे... पत्नी , बच्चे इस उदासी का कारण जानना चाहते थे .*

*मोहन ने अपने परिवार को अपने पास बिठाया . उन्हें प्यार से समझाया कि मैंने तुम से चार दिन बात नहीं की तो तुम कितने परेशान हो गए ? अब सोचो तुम पिताजी के साथ ऐसा व्यवहार करके उन्हें कितना दुख दे रहे हो ?*

*मेरे पिताजी मुझे जान से प्यारे हैं . जैसे तुम्हारी माँ ! और फिर पिताजी के अकेले स्टेशन जाकर घंटों बैठकर रोने की बात छुपा गया . सभी को अपने बुरे व्यवहार का खेद था .*

*उस दिन जैसे ही पिताजी शाम को घर लौटे , तीनों बच्चे उनसे चिपट गए ...! दादा जी ! आज हम आपके पास बैठेंगे...! कोई किस्सा कहानी सुनाओ ना .*

*पिताजी की आँखें भीग गई . वो बच्चों को लिपटकर उन्हें प्यार करने लगे . और फिर जो किस्से कहानियों का दौर शुरू हुआ वो घंटों चला . इस बीच मोहन की पत्नी उनके लिए फल तो कभी चाय नमकीन लेकर आती . पिताजी बच्चों और मोहन के साथ स्वयं भी खाते और बच्चों को भी खिलाते . अब घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था ! !!*

*एक दिन मोहन बोला , पिताजी...! क्या बात है ! आजकल काका के घर नहीं जा रहे हो ...? नहीं बेटा ! अब तो अपना घर ही स्वर्ग लगता है ...! !!*

*आज सभी में तो नहीं लेकिन अधिकांश परिवारों के बुजुर्गों की यही कहानी है . बहुधा आस पास के बगीचों में , बस अड्डे पर , नजदीकी रेल्वे स्टेशन पर परिवार से तिरस्कृत भरे पूरे परिवार में एकाकी जीवन बिताते हुए ऐसे कई बुजुर्ग देखने को मिल जाएंगे .*

*आप भी कभी न कभी अवश्य बूढ़े होंगे ही . आज नहीं तो कुछ वर्षों बाद होंगे . जीवन का सबसे बड़ा संकट है बुढ़ापा ! घर के बुजुर्ग ऐसे बूढ़े वृक्ष हैं , जो बेशक फल न देते हों पर छाँव तो देते ही हैं !*

*अपना बुढापा खुशहाल बनाने के लिए बुजुर्गों को अकेलापन महसूस न होने दीजिये , उनका सम्मान भले ही न कर पाएँ , पर उन्हें तिरस्कृत मत कीजिये . उनका खयाल रखिये।

15/08/2023

रजनी कुछ दिनों से महसूस कर रही थी कि जब वह अपने मोहल्ले से निकलती है और जब शाम को अपनी जॉब से मोहल्ले में वापस आती है तब उसे देखकर कुछ लोग कानाफूसी शुरू कर देते हैं। एक बार उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उनकी बातचीत में उसे अपने पति नीलेश का नाम सुनाई दिया। जबसे नीलेश की जॉब चली गई थी तब से वह घर पर ही एक कमरे में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था और खाना भी बना लेता था। उसकी मदद के कारण रजनी बिना टेंशन के अपनी जॉब पर चली जाती थी। इधर कुछ दिनों से उसे नीलेश के व्यवहार में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे थे और साथ ही मोहल्ले के लोगों में कुछ कानाफूसी भी हो रही थी।
तब एक दिन अचानक रजनी दोपहर के समय अपने ऑफिस से घर आ गई। उस समय नीलेश बच्चों की ट्यूशन ले रहा था। कमरे का दरवाजा हल्का सा बंद था। रजनी ने उसे हाथ से धकेल दिया और सामने का दृश्य देखकर उसके मन में घृणा और क्रोध उत्पन्न हो गया। उसका शक सही निकला।
नीलेश एक छोटी बच्ची को अपनी गोद में बिठाकर उसके शरीर को गलत तरीके से स्पर्श कर रहा था। यह देखते ही रजनी गुस्से में उबल पड़ी और जोर से चिल्लाई-"शर्म करो, तुम्हें तो अपनी इस हरकत पर डूब मरना चाहिए। क्या तुम भूल गए हो कि इस उम्र की हमारी भी एक बच्ची है। कुछ दिनों से मुझे तुम पर शक हो रहा था लेकिन मैं तुम्हें रंगे हाथों पकड़ना चाहती थी। तुम जाकर कहीं डूब मरो क्योंकि मैं अपनी बेटी को साथ लेकर यहां से जा रही हूं। मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।"
नीलेश पहले तो अकड़कर बोला-"मैंने कुछ नहीं किया है मैं तो इसे प्यार से गणित के सवाल समझा रहा था।"
लेकिन जब रजनी ने उसे छोड़कर जाने की बात की तब वह गिड़गिड़ाने लगा और माफी मांगने लगा।
तब रजनी ने बात को गहराई से सोचते हुए, उसे घर को ना छोड़ कर जाने का फैसला किया क्योंकि उसे लगा कि नीलेश उसके जाने से पूरी तरह आजाद हो जाएगा। उसने मन में ठान लिया था कि नीलेश को अब सही राह पर लाकर ही रहूंगी।

15/08/2023

पहले चित्र में ये सब्जी वाले जिनका नाम 'सोबरन' है, असम के तिनसुखिया जिले के हैं। जब ये 30 वर्ष के थे तब इन्हें कचरे के डिब्बे में पड़ी रोती हुई छोटी बच्ची मिली, वही बच्ची जो दूसरे चित्र में है... वो उसे अपने साथ घर ले गए... और उन्होंने चुना कि अब उन्हें शादी नही करनी है इसी बच्ची को पालना, पढ़ाना है... उसका नाम उन्होंने ज्योति रखा था...।।

उन्होंने सब्जी बेचते हुए ज्योति को पढ़ाया, आज ज्योति 25 साल की है, 2013 में ज्योति ने कंप्यूटर साइंस से ग्रेजुएशन किया और 2014 में असम पब्लिक सर्विस कमीशन में सेलेक्ट हुईं!

आज ज्योति असम में इनकम टैक्स असिस्टेन्ट कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं!!

आज जब सोबरन से पूछा जाता है कि उस वक़्त क्या आपको पता था कि आप उस बच्ची को पढ़ा लिखाकर इस पद तक पहुंचा देंगे तो वो एक ही बात कहते हैं...

"मुझे नही पता मैंने कचरे से किसको उठाया था मुझे बस इतना पता है कि मुझे कोयले की खान से
एक हीरा मिला था...!!"

प्रणाम है 🙏 उस सोबरन और उस जैसे हर सोबरन को जो जाति, पात, धर्म, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, घमंड, अहंकार से दूर होकर किसी मात्र जीवित को जीने लायक जीवन एवं उज्ज्वल भविष्य दे रहे हैं...।।

यही लोग असली हीरो हैं मित्रों 💕❤️💕

15/08/2023

भारतीय यात्री का Passport चेक करते ही चकरा गया स्टाफ

अबू धाबी में फ्लाइट रुकने के बाद स्टाफ ने जैसे ही एक भारतीय यात्री का पासपोर्ट चेक किया उसकी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। स्टाफ को पासपोर्ट पर लिखी उम्र की संख्या पर यकीन नहीं हुआ और ऐसा लग रहा था कि पासपोर्ट नकली है क्योंकि वर्ष 1896 में पैदा हुआ एक व्यक्ति कैसे यात्रा कर सकता है।

बताते चलें कि फ्लाईट कोलकाता से लंदन जा रही थी। इस दौरान फ्लाइट अबू धाबी में रुकी थी। अचानक एक स्टाफ ने एक व्यक्ति का पासपोर्ट चेक किया और पासपोर्ट पर लिखे डेट ऑफ बर्थ को देखकर होश गवा बैठा। उसी यकीन नहीं हो रहा था कि बस 1896 में पैदा हुआ व्यक्ति फ्लाइट में यात्रा कर सकता है और आसान से चल फिर सकता है।

15/08/2023
15/08/2023

मेरे प्यारे देशवासियो,
देश के 77वें स्वतंत्रता दिवस पर आप सभी को मेरी हार्दिक बधाई! यह दिन हम सब के लिए गौरवपूर्ण और पावन है। चारों ओर उत्सव का वातावरण देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है। यह प्रसन्नता और गर्व की बात है कि कस्बों और गांवों में, यानी देश में हर जगह - बच्चे, युवा और बुजुर्ग - सभी उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस के पर्व को मनाने की तैयारी कर रहे हैं। हमारे देशवासी बड़े उत्साह के साथ 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' मना रहे हैं।

स्वाधीनता दिवस का उत्सव मुझे मेरे बचपन के दिनों की याद भी दिलाता है। अपने गाँव के स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग लेने की हमारी खुशी, रोके नहीं रुकती थी। जब तिरंगा फहराया जाता था तब हमें लगता था जैसे हमारे शरीर में बिजली सी दौड़ गई हो। देशभक्ति के गौरव से भरे हुए हृदय के साथ हम सब, राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते थे तथा राष्ट्रगान गाते थे। मिठाइयाँ बाँटी जाती थीं और देशभक्ति के गीत गाए जाते थे, जो कई दिनों तक हमारे मन में गूँजते रहते थे। यह मेरा सौभाग्य रहा कि जब मैं, स्कूल में शिक्षक बनी तो मुझे उन अनुभवों को फिर से जीने का अवसर प्राप्त हुआ।

जब हम बड़े होते हैं, तो हम अपनी खुशी को बच्चों की तरह व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय पर्वों से जुड़ी देशभक्ति की गहरी भावना में तनिक भी कमी नहीं आती है। स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हम केवल एक व्यक्ति ही नहीं हैं, बल्कि हम एक ऐसे महान जन-समुदाय का हिस्सा हैं जो अपनी तरह का सबसे बड़ा और जीवंत समुदाय है। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिकों का समुदाय है।

जब हम स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाते हैं तो वास्तव में हम एक महान लोकतन्त्र के नागरिक होने का उत्सव भी मनाते हैं। हममें से हर एक की अलग-अलग पहचान है। जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र के अलावा, हमारी अपने परिवार और कार्य-क्षेत्र से जुड़ी पहचान भी होती है। लेकिन हमारी एक पहचान ऐसी है जो इन सबसे ऊपर है, और हमारी वह पहचान है, भारत का नागरिक होना। हम सभी, समान रूप से, इस महान देश के नागरिक हैं। हम सब को समान अवसर और अधिकार उपलब्ध हैं तथा हमारे कर्तव्य भी समान हैं।

लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था। भारत लोकतंत्र की जननी है और प्राचीन काल में भी हमारे यहां जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाएं विद्यमान थीं। किन्तु लंबे समय तक चले औपनिवेशिक शासन ने उन लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मिटा दिया था। 15 अगस्त, 1947 के दिन देश ने एक नया सवेरा देखा। उस दिन हमने विदेशी शासन से तो आजादी हासिल की ही, हमने अपनी नियति का निर्माण करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त की

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